एक लड़की

मैं एक लड़की हूँ |

इस  बात का एहसास है मुझे ,

इस बात का एहसास कराया है मुझे –

इस समाज ने ; मेरे अपनों ने ,

न जाने कितनी बार  मेरी काबिलियत को मेरे  ‘लड़की’ होने पर आंका गया है ,

न जाने कितनी बार मेरे चरित्र को मेरे कपड़ों से नापा गया है ,

न जाने कितनी बार मेरी इच्छाओं का दम घोंट के उन्हें दरक़िनार किया गया है ,

न जाने कितनी बार मुझे ‘दामिनी’  और ‘निर्भया’ बनाया गया है ,

कभी सताया गया है तो कभी जलाया गया है ,

न जाने कितनी बार मुझे चुप कराया गया है-

“चुप रहो ! मत भूलो की तुम एक लड़की हो |”

और न जाने कितनी बार मैं चुप रही , क्योंकि,

“मैं एक लड़की हूँ “|

कैसी विडम्बना है ये ?

कैसा समाज है ?

कभी देवी बना के पूजता है ,

तो कभी एक झटके में ही इतना नीचें गिरा देता है ,

और, मैं ?

“मैं एक लड़की हूँ ”

समाज के पिंजरे में क़ैद ,

अपनी आज़ादी के लिए चींखती हुई ,

“एक लड़की”  |

-श्रद्धा चौहान

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